हमारी कहानी
शुरुआत इसलिए हुई कि किसी और ने ख़राब बना दिया था।
इस परिवार में भगवान जी के वस्त्र सौरभ के पिताजी के समय से बनते आ रहे हैं। दीपिका इसी काम के बीच बड़ी हुईं।
फिर एक बार काम बाहर के दर्ज़ी को दिया गया और वह ख़राब बनकर लौटा। मानसी अग्रवाल ने उसे मना कर दिया और ख़ुद बना दिया। वे इतनी सुंदर बनीं कि ऑर्डर आने लगे।
यही बात सालों बाद फिर हुई। बाज़ार से मँगाई पोशाक की लाइनिंग ख़राब निकली और कपड़ा इतना सख़्त कि भगवान जी को चुभे। दूसरी बार भी वही नतीजा: सही चाहिए तो ख़ुद ही बनाना पड़ेगा।
हम मानते हैं कि उनमें जान है। इसलिए कुछ भी सख़्त नहीं, और कुछ भी चुभने वाला नहीं।
“दीपिका” क्यों
सब यही समझते हैं कि यह किसी का नाम है। यह देवी का नाम है — और यही नाम पिताजी ने अपने पहले व्यापार को दिया था।
अभी क्यों
घर छोटे हो गए हैं और दिन व्यस्त। मंदिर अब भी है, और हममें से ज़्यादातर को कभी सिखाया ही नहीं गया कि उसे ढंग से कैसे सजाया जाता है। लोगों ने कहा सामान आपके यहीं रहने दीजिए — और वहीं से सब कुछ एक ही छत के नीचे हो गया।







